विक्रमोत्सव 2025 के अंतर्गत आयोजित हुआ कार्यक्रम, जिला स्तरीय कार्यक्रम में शामिल हुए प्रभारी मंत्री

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इस वर्ष 30 मार्च 2025 (दिन रविवार) से हिन्दू नववर्ष यानि नव संवत्सर 2082 शुरू हो रहा है। गुड़ी पड़वा के दिन हिन्दू नव संवत्सरारम्भ माना जाता है। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा भी कहा जाता है। इस दिन हिन्दू नववर्ष विक्रम संवत् का आरम्भ होता है। विक्रम संवत् का आरम्भ 57 ई.पू. में हुआ था। विक्रमोत्सव 2025 के अंतर्गत सूर्यकोटि उपासना कार्यक्रम का आयोजन हुआ। साथ ही विश्व गीता प्रतिष्ठानम शाखा शिवपुरी के अंतर्गत नवसंवत्सर अभिनंदन समारोह का आयोजन हुआ। जिले के प्रभारी मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर कार्यक्रम में अतिथि के रूप में शामिल हुए और उन्होंने समस्त जिले वासियों को गुड़ी पड़वा और नव संवत्सर की शुभकामनाएं दी और कहा कि यह हमारी संस्कृति का प्रतीक है। आज हमारे नव वर्ष की शुरुआत है। यह सभी में उत्साह और उमंग के साथ काम करने की प्रेरणा लाए। उन्होंने कहा कि हमें  सामाजिक बुराइयों के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है। उन्होंने नशा मुक्ति से युवा पीढ़ी को बचाने का आवाहन किया और शिवपुरी शहर को स्वच्छ बनाए रखने में सभी नागरिकों के योगदान की बात कही।

कार्यक्रम को विधायक देवेंद्र जैन ने भी संबोधित करते हुए नव संवत्सर की शुभकामनाएं दीं और भारतीय संस्कृति और परंपरा के महत्व को याद किया।
कार्यक्रम में जिला पंचायत अध्यक्ष नेहा यादव, नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा, हेमंत ओझा, हरवीर रघुवंशी सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण, कलेक्टर रवींद्र कुमार चौधरी पुलिस अधीक्षक अमन सिंह राठौड़ जिला पंचायत सीईओ हिमांशु जैन सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी और स्कूली छात्र-छात्राएं भी उपस्थित रहे
कार्यक्रम में रीवा से आए अमरवाड़ी कलाकार मंडल के समूह ने विक्रमादित्य के जीवन पर आधारित और विक्रम संवत की शुरुआत की पृष्ठभूमि पर नाटक का मंचन किया। प्रभारी मंत्री ने कलाकारों का पुष्पगुच्छ भेंटकर स्वागत किया।
उल्लेखनीय है कि इसी प्रतिपदा के दिन आज से 2081 वर्ष पूर्व उज्जयनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांत शकों से भारत-भू का रक्षण किया और इसी दिन से काल गणना प्रारंभ की। उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमी संवत कह कर पुकारा। महाराज विक्रमादित्य ने राष्ट्र को सुसंगठित कर शकों की शक्ति का उन्मूलन कर देश से भगा दिया और उनके ही मूल स्थान अरब में विजयश्री प्राप्त की। साथ ही यवन, हूण, तुषार, पारसिक तथा कंबोज देशों पर अपनी विजय ध्वजा फहराई। उसी के स्मृति स्वरूप यह प्रतिपदा संवत्सर के रूप में मनाई जाती है।



'गुड़ी' का अर्थ 'विजय पताका'


कहते हैं कि मराठी राजा शालिवाहन ने मिट्टी के सैनिकों की सेना से प्रभावी शत्रुओं (शक) का पराभव किया। इस विजय के प्रतीक रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। ‘युग‘ और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में ‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ' गुढी पाडवा ' अर्थात् मराठी नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन चैत्र नवरात्रि का प्रारम्भ होता है। कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्मा ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधर्व, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुरू होता है। अत: इस तिथि को ‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं। चैत्र ही एक ऐसा महीना है, जिसमें वृक्ष तथा लताएं पल्लवित व पुष्पित होती हैं। शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही प्रदान करता है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। इसीलिए इस दिन को वर्षारम्भ माना जाता है। ‘उगादि‘ के दिन ही पंचांग तैयार होता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते हुए ‘पंचांग‘ की रचना की। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र में गुड़ी पाड़वा कहा जाता है।

विक्रम संवत् हमारा राष्ट्रीय संवत् कहलाता है। यह सर्वथा शुद्ध और वैज्ञानिक है। यह हमारी अस्मिता और स्वाधीनता के अनुरक्षण तथा शत्रुओं पर विजय का प्रतीक भी है। इसी संवत् के अनुसार ही हमारे सभी धार्मिक अनुष्ठान, तीज त्यौहार जैसे – होली, दीवाली, दशहरा आदि मनाए जाते है। विक्रम संवत् सभी काल गणना से प्राचीन तो है ही वैज्ञानिक भी है। नेपाल के सरकारी संवत् के रुप मे विक्रम संवत् ही चला आ रहा है। इसमें चान्द्र मास एवं सौर नक्षत्र वर्ष (solar sidereal years) का उपयोग किया जाता है।
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